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नियोजित ग्रामीण विकास कार्यक्रम एवं परिवर्तन (Planned Rural Development Program and Change)

नियोजित ग्रामीण विकास कार्यक्रम एवं परिवर्तन

कुशकुल दीप

सारांश 
ग्रामीण भारत के चहुमुखी विकास का सपना विश्व के महान राजनीतिक संत महात्मा गांधी का था, उनका कहना था कि ‘‘दिल्ली भारत नहीं है, भारत तो गांवों में बसता है।’’ अतः यदि हमें भारत को उन्नत करना है तो गाँवों की दशा एवं विकास की दिशा में सुधार करना होगा। भारत आज जनसंख्या की दृष्टि से विश्व का दूसरा सबसे बड़ा देश है और इसकी आबादी में निरंतर वृद्धि जारी है। जो विकास को कई स्तरों पर अवरोधित करती है ऐसी स्थिति में भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने का सपना महज एक सपना ही रह जायेगा। परिणामस्वरूप स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमारे देश में कृषि, उद्योग, यातायात, संचार, शिक्षा, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था आदि सभी क्षेत्रों में विकास के मद्देनजर सामुदायिक विकास कार्यक्रम और अन्य सहायक योजनाओं को तेजी से बढ़ावा मिला। 
प्रस्तावना-
हमारे देश में 2011 की जनगणना के अनुसार 6 लाख 40 हजार गाँव है, जहॉ देश की लगभग 78 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। जहाँ एक तरफ आबादी में दिनों दिन वृद्धि परिलक्षित है वहीं दुसरी ओर संसाधनों में निरंतर कमी स्पष्ट दृष्ट है। इसके चलते आज गांव और शहर की खायी को पाटना मुश्किल सा लग रहा है ऐसे में ग्रामीण जीवन के सुधरते-बीगड़ते स्तर की चर्चा करना बहुत ही दुष्कर कार्य है। ग्रामीण विकास को प्रतिबद्ध भारत सरकार के तरफ से अनेकों प्रयास किये जा रहे है, जिसकी वचन बद्धता को पूर्ण करने हेतु 1984-85 में राजीव गांधी ने भारत के गांवों को सर्वशक्तिमान बनाने हेतु विशेष अभियान की शुरूआत की, जिसे अमली जामा पहनाने का काम प्रधानमंत्री पी0वी0 नरसिंह राव ने 1991 में पूर्ण किया और देश के ग्रामीण मंत्रालय का बजट रक्षा बजट और रेल बजट के बाद तीसरा सबसे भारी भरकम बजट वाला विभाग बन गया, यहाँ तक कि ग्रामीण विकास और जागरूकता को लक्ष्य मानकर ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना का शीर्षक ही समावेशी विकास रख दिया गया । भारत सरकार द्वारा क्रियान्वित ग्रामीण विकास योजनाएं भले ही ग्रामीणों की आवश्यकताआेंं, आकांक्षाओं अथवा अपेक्षाओं के अनुरूप विकास की दर में वृद्धि कर पाने में सफल न हो पर वास्तविकता यह है कि विकास की ये योजनाएं स्कूल, सड़क, बिजली, पानी, मकान जैसी मूल संसाधनों को गांवों तक पहुचाने में सफल सिद्ध हुयी है। ग्रामीण विकास एक बहुआयामी अवधारणा है जिसका विश्लेषण संकुचित एवं व्यापक दो आधारों पर किया गया है। संकुचित दृष्टि से अभिप्राय ग्रामीण मूल संरचना में परिवर्तन से है वहीं व्यापक दृष्टिकोण से ग्रामीण विकास का अर्थ है ग्रामीणों के जीवन में गुणात्मक उन्नति हेतु सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं संरचनात्मक परिवर्तन से है। जिस पर आगे चर्चा की गयी है।
आवासीय सुविधाओं की भूमिका
जनसंख्या वृद्धि सदैव आवासीय समस्या को जन्म देती है क्यों कि आवास मनुष्य की महत्वपूर्ण आवश्यकताओं में से एक है। गौतम बुद्ध ने कहा था ‘‘बिना आवास के मानव का भावनात्मक, बौद्धिक व आत्मिक रूप से पूर्ण विकास नहीं हो सकता है’’ इस प्रकार ‘आवास’ मानव विकास का अभिन्न अंग है। भारत सरकार ने ग्रामीण निर्धन अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, मुक्त किये गये बंधुआ मजदूरों के लिए 1985-86 में आवास योजना के माध्यम से मुफ्त आवास प्रदान करने का कार्यक्रम शुरू किया है। 1993-94 में लाभार्थियों में ग्रामीण निर्धनों, सेना के शहीद परिवारों एवं विकलांगों को भी शामिल कर लिया गया।
इंदिरा आवास योजना भारत की सबसे लोकप्रिय आवास योजना है। यह योजना एक जनवरी 1996 में 80 प्रतिशत केन्द्र व 20 प्रतिशत राज्य की खर्च के साथ संचालित हुई, 1999 से बजट में परिवर्तन कर 75 प्रतिशत केन्द्र व 25 प्रतिशत राज्य द्वारा देय बनाया गया। इंदिरा आवास योजना की निधि का संचालन जिला ग्रामीण विकास एजेंसियों/ जिला परिषदों द्वारा जिला स्तर पर किया जाता है, परिवर्तन के परिणाम स्वरूप अनुदानित मानकों में परिवर्तन कर 25,000 मैदानी इलाकों में एवं 27,000 रूपये पहाड़ी इलाकों में देय है। 1985-86 से अब तक योजना पर 22,000 करोड़ रूपये खर्च करके 124 लाख मकान बनाए गये है। भारत सरकार की एक महात्वाकांक्षी योजना प्रधानमंत्री ग्रामोदय (ग्रामीण आवास) योजना की शुरूआत 1990-2000 में की गयी । यह योजना इंदिरा आवास योजना की ही रूप रेखा पर आधारित है। वर्तमान सरकार की बेहद महत्वाकांक्षी योजना भारत निर्माण योजना (ग्रामीण आवास) जिसकी औपचारिक शुरूआत 16 मई 2005 को की गयी, एक विकासोन्मुख योजना के तौर पर गाँव को विकास की धारा से जोड़ने के लिए अपने अंदर बुनियादी आवश्यकता से जुड़े छः प्रमुख क्षेत्रों को समाहित किए हुए है।
पेयजल व्यवस्था के लिए प्रयास
‘‘जल है तो जीवन है’’ जैसी वैचारिकी से पोषित मानव समाज में जल की महत्ता सबसे अधिक व हर जगह एक समान है। पौराणिक ग्रंथों में जल को ‘इन्द्र जल’ कहा गया है। यह प्रकृति का ऐसा वरदान है जो वर्षा के माध्यम से हमें प्राप्त होता है, न केवल मनुष्य अपितु सम्पूर्ण जीव जगत की प्यास बुझाता है। प्राकृतिक संसाधनों से व्याप्त भारत भूमि पर जल संसाधनों की उपलब्धता प्रचुर में मात्रा है। परन्तु वर्तमान मानव द्वारा जल का अनियोजित दोहन जल के संदर्भ में भविष्य के लिए चिंता का विषय है। जिससे भिग्य भारत सरकार ने जल संचरण व शुद्ध जल की ग्रामों में उपलब्धता पर विशेष ध्यान देते हुए, प्रथम पंचवर्षीय योजना में ही लगभग 55,000 करोड़ की राशि से लगभग 37 लाख हैंडपम्प लगवाया गया ताकि स्वच्छ पेय जल की उपलब्धता सर्वत्र एक समान हो सके। 1,73,000 नल जलापूर्ति परियोजनाओं की स्थापना की गयी जिसके पश्चात् भारत विश्व का सबसे बड़ा जलापूर्ति नेटवर्क वाला देश बना। ‘त्वरित ग्रामीण जल आपूर्ति कार्यक्रम 2002’ और ‘स्वजल धारा’ योजना इन सबका एक ही उद्देश्य है, भारतीय गाँवों में स्वच्छ पेय जल की आपूर्ति।
बिजली की आपूर्ति एवं ग्रामीण विकास 
आधार भूत संरचना किसी देश के आर्थिक विकास की घूरी होती है, देश के सामाजिक, आर्थिक विकास की आधार स्थापना में, औद्योगिक विकास एवं ग्रामीण इलाकों के लोगों को खाद्य और आजीविका सम्बंधी सुरक्षा प्रदान कराने में बिजली की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ग्रामीण विद्युतिकरण एवं ऊर्जा के स्रोतों को आम जन तक पहुचाने को प्रतिबद्ध भारत सरकार देश के हर गाँव को इस कार्यक्रम में जोड़ रही है। जिसमें वह कई जगहों पर पूर्ण रूपेण सफल है, जैसे- पंजाब, केरल, नागालैण्ड आदि। तो वहीं दूसरी तरफ बढ़ती आबादी के कारण अनेक जगह पर निराशाजनक प्रदर्शन परिलक्षित करती है। जिसके कारण अब तक 5,86,000 भारतीय गांवों में से केवल 1,40,000 के लगभग गांवों मे ही विद्युतिकरण हो पाया है। पर्यावरणीय संसाधन प्रबंधन, शुद्ध पेय जलापूर्ति, अत्याधुनिक अस्पताल, स्कूल, संचार माध्यम की उपलब्धता में वृद्धि यह प्रदर्शित करती है कि आज भारत के गांव विशेषकर मैदानी क्षेत्र इस सुविधा का लाभ तो प्राप्त कर पा रहें है, परन्तु सुविधाओं का उच्च स्तरीय लाभ अबाध विद्युतापूर्ति पर निर्भर करता है, जिसके लिए भारत सरकार द्वारा ‘‘राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतिकरण’’ योजना के तहत भारत के सम्पूर्ण ग्रामीण इलाकों को बिजली से जोड़ने को संकल्पित है।
परिवहन के साधनों में सुधार
परिवहन जनसंचार एवं विकास का आधार भूत स्तम्भ है क्यों कि सड़कें विकास की बाहक होती है। इस संदर्भ में जॉन एफ कनेडी ने कहा कि ‘‘सड़के हमारा धन न होंगी बल्कि सड़के हमारा धनोपार्जन करेंगी’’ परिणाम स्वरूप भारत सरकार ने समस्त भारत में सड़को का जाल बुनने की वचनबद्धता के फलस्वरूप प्रधानमंत्री ग्राम सड़क निर्माण योजना, स्वर्णीम चतुर्भुज, गंगा व यमुना एक्सप्रेस वे आदि बड़ी परियोजनाएं स्थापित की ताकि विकास को गति दी जा सके, रोजगार का सृजन किया जा सके। मैदानी क्षेत्र में 1000 एवं पर्वतीय व आदिवासीय क्षेत्र में 500 की आबादी वाले प्रत्येक गांव को बारहमासी मुख्य सड़कों से जोड़ने वाली ‘प्रधानमंत्री ग्राम सड़क निर्माण योजना 2000’ सम्पूर्ण भारत में केन्द्र सरकार द्वारा समानान्तर चलायी जा रही है। सत्र् 2013-14 में योजना के लिए 21,700 करोड़ रूपये का बजट आवंटित कराया गया है। जिसके क्रांतिकारी प्रभाव के परिणाम स्वरूप गांवों और शहरों की दूरियां समाप्त हो चली है, उत्पादन व व्यापार के उचित साधनों का विकास हुआ है, साथ ही कृषि और उपज का बाजार से सम्पर्क बड़ा जिसने द्वितीय हरित क्रांति की ओर कदम बढ़ाना शुरू कर दिया है।
शिक्षा विकास का मार्ग
सरकारी तंत्र द्वारा संचालित आठ प्रमुख कार्यक्रमों में दो ‘सर्व शिक्षा अभियान‘ एवं ‘मध्याह्न भोजन योजना‘ शिक्षा से ही सम्बंधित हैं, क्योंकि शिक्षा को विकास की सीढ़ी, परिवर्तन का माध्यम और आशा का अग्रदूत कहा जाता है। नौवीं पंचवर्षीय योजना में प्रारम्भ (85 प्रतिशत केन्द्र व 15 प्रतिशत राज्य के खर्च पर आधारित) सर्व शिक्षा अभियान देश के समस्त 6 से 14 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों को शिक्षित करने के उद्देश्य से निर्मित व संचालित हो रही है। जिसका उद्देश्य 2010 तक देश के हर बच्चे को शिक्षित करना हैं। योजना खर्च में प्रायः परिवर्तन होते रहे हैं जो 10वीं योजना में 72 व 25 प्रतिशत खर्च व उसके बाद से 50-50 प्रतिशत खर्च के आपसी बजट के साथ यह योजना कार्यरूप में संचालित है। जिसके तहत विद्यालयों का निर्माण, उचित शैक्षिक वातावरण निर्माण, शिक्षकों की न्युक्तियां व गुणात्मक शिक्षा की व्यवस्था करना मुख्य उद्देश्यों में शामिल है। जिसकी पूर्ति के लिए कई सहायक योजनाओं को भी निरंतर संचालित किया जा रहा है। जिसमें मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय की मिड-डे मील योजना (1995) और कस्तुरबा गांधी बालिका शिक्षा योजना (1997) प्रमुख है।
ग्रामीण रोजगार योजना
एक प्रजातांत्रिक राष्ट्र में निर्वाचित सरकार का प्रमुख दायित्व है कि वह अपनी जनता के सम्मान, कार्य क्षमता एवं सामर्थ्य को बनाए रखें। इस दायित्व निर्वहन के लिए विविध सरकारों द्वारा अलग-अलग समयों में कई रोजगार योजनाएं चलायी गयी। जिनमें राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना (1989-90), ग्रामीण भूमिहीन रोजगार योजना (1983-89), जवाहर रोजगार योजना (1989-90), जवाहर ग्राम समृद्धि योजना (1999-2000), सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना (2001), कार्य के बदले अनाज की राष्ट्रीय योजना (2004) प्रमुख है। परन्तु इन योजनाओं का अपेक्षित सफलता न प्राप्त कर पाना नयी योजना के निर्माण का कारण बना। इनमे से दो योजनाओं सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना और कार्य के बदले अनाज योजना को एक साथ समाहित कर ‘‘राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना 2005’’ का सृजन किया गया, जो प्रारम्भ में देश के अति पिछड़े 200 जिलों से संचालित होकर अप्रैल 2007 में 330 जिलों व अप्रैल 2008 से के समस्त 615 जनपदों में समानान्तर संचालित है। यह योजना गांव के प्रत्येक परिवार को वर्ष में 100 दिनों का अकुशल श्रम/रोजगार सुनिश्चित कराने की गारण्टी देती है। जो वर्तमान में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना (2009 से) के संशोधित नाम के साथ देश के समस्त ग्रामीण परिवारों को रोजगार की सुनिश्चितता प्रदान करता है, रोजगार न मिलने पर यह मुआवजा राशि के भुगतान को भी सुनिश्चित करती है। ग्रामीण आर्थिक समृद्धि व बेरोजगारी की समस्या से निदान के विकल्प के रूप में यह योजना 2011-12 तक 500 लाख ग्रामीण परिवारों को रोजगार उपलब्ध कराने में सफल रही है। 
ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यक्रम
गरीब लोगों और सुदूरवर्ती क्षेत्रों पर अधिक ध्यान देते हुए ग्रामीण क्षेत्रों में अभिगम्य, वहनीय और जवाबदेही वाली गुणात्मक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए सरकार द्वारा ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यक्रमों को निरंतर संचालित किया जाता रहा है परन्तु वर्तमान समय में संचालित ‘राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (2005)’ ग्रामीण स्वास्थ्य के लिए प्रतिबद्ध एवं जीवन प्रत्यासा की वृद्धि के लिए प्रतिबद्ध योजना के रूप में संचालित है। वर्ष 2010-11 के केन्द्रीय बजट में 15,440 करोड़ रूपये का बजट इस योजना पर खर्च किया गया। यह योजना सम्पर्ण देश में स्वास्थ्य सुविधाओं का संचालन कर रही है, जिसमें 18 राज्यों पर विशेष ध्यान दिया गया है। मिशन का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000 और राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति दोनों के लक्ष्यों को प्राप्त करना है। जिसमें शिशु मृत्युदर में 30/100000 जीवित जन्म से नीचे तक कटौती, मातृ मृत्युदर 100/1000 जीवित जन्म से नीचे आने  तथा कुल प्रजनन दर 2012 तक 2 बच्चे प्रति महिला पर लाना है।
बेहतर होती संचार सेवाएं
वर्तमान् युग संचार क्रांति का युग हैं यहां जनसंचार एवं दूरसंचार की बातें अलग-अलग करना नाइंसाफी होगी। क्यों कि सूचना प्रौद्योगिकी में हुए विकास ने रेडियों, टी.वी., इन्टरनेट, टेलीफोन, मोबाइल की दूरीयों को इतना कम कर दिया है कि अब ये माध्यम एक दूसरे के बिना अधूरे लगते है। सूचना प्रौद्योगिकी की वजह से जैसे-जैसे जनसंचार एवं दूरसंचार की दूरियां घटी है, वैसे-वैसे ही दुनियां भर के लोगों के मध्य इनकी उपलब्धता एवं अनुपलब्धता को लेकर खायी बढ़ती जा रही है। वर्तमान भारतीय गांव इस संचार क्रांति से अछूते नहीं रहे है। संचार क्षेत्र में भारत का विश्व में पांचवां स्थान है। संचार क्रांती की इस विकास यात्रा को निरंतर बढ़ावा मिल रहा है, सरकार संचार क्षेत्र में नित नये प्रयोगो के साथ एक नये युग निर्माण का रास्ता प्रशस्त कर रही है। 
निर्वहनीय विकास और ग्रामीण विकास
संपोषित ग्रामीण विकास के संदर्भ में भारत की रणनीति अधिक तेज और समग्र विकास प्राप्त करने की है। ‘भारत निर्माण योजना 2005’ तेज और समग्र ग्रामीण विकास की दिशा में एक सोची-समझी रणनीति है जिसमें सरकार ने मूलभूत आवश्यकताओं से सम्बंधित छः प्रमुख क्षेत्रों को चुना गया है। 
10 मिलियन हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचाई क्षमता का विकास करना है।
प्रत्येक गांव को दूरभाष से जोड़ा जाना है। 
2009 तक ग्रामीण निर्धनों के लिए 6 मिलियन अतिरिक्त आवासों का निर्माण किया जाना।
प्रत्येक गांव में बिजली मुहैया करायी जाए।
देश के प्रत्येक गांव को बारहमासी सड़कों से जोड़ना (मैदानी क्षेत्र में 1000 व आदिवासिय एवं पर्वतीय क्षेत्र में 500 की जनसंख्या वाले)।
सभी गांवों में शुद्ध पेयजल आपूर्ति की व्यवस्था।
निष्कर्ष-
उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि विविध काल खण्ड़ों में ग्रामीण विकास के लिए किये गये सरकारी प्रयासों ने स्वतंत्रोत्तर गांवों को पूर्णरूपेण परिवर्तित कर दिया है। आज गांव विकास के कारण हर स्तर पर सभ्य समाज से कंधा मिलाये खडे़ हैं जिसमें महात्मा गांधी के ‘सपनों का भारत’ की सोच स्पष्टतः दृष्टिगाचर हो रहीं है। भारत की 78 प्रतिशत आबादी चुंकि गांवों में निवास करती है अतः गांव का विकास एक अहम मुद्दा है, ग्रामीण जनता का जागरूक व सशक्त होना नितांत आवश्यक है, उनके चहोमुखी विकास के लिए आर्थिक क्षेत्रों का विकास, राजनैतिक सहाभागिता, सामाजिक न्याय आदि की प्राप्ति आवश्यक है। 1951 के सामुदायिक विकास कार्यक्रम से अब तक के विकास के लिए जिम्मेदार तंत्र सराहना के योग्य है। यह तो सिक्के का एक पहलू है इसका दूसरा पहलू इससे उलट स्थिति को प्रकट करता है, जहां भारत के कुछ क्षेत्रों में विकास की बयार न पहुंच पाना चिंता का विषय है, अतः हमारी सोच सम्पूर्ण भारत के विकास के प्रति एक समान, निश्छल व विकासवादी होनी चाहिए। तब जाकर विकास के परिणामस्वरूप भारतीय गांव के बनेंगे सशक्त, समृद्ध और आत्मनिर्भर।

संदर्भ
  1. कुरूक्षेत्र (क्टूबर 2013) ग्रामीण भारत में सुधरता जीवन स्तर, विशेषांक।
  2. सिंह, कटार (2011)‘‘ ग्रामीण विकास’’, सेज पब्लिकेशन, जयपुर।
  3. सचदेव, डी. आर. (2011) ’’भारत में समाजकल्याण प्रशासन’’,किताब महल, इलाहाबाद।
  4. तिवारी, जय कान्त (2003) ‘‘भारत का समाजशास्त्र’’, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ।
  5. J.K Tiwari (1994) ‘Rural Transfarmation in India’ .New Delhi.
  6.   Planning commission Report
  7.   NSSO data
  8. Maheshwari, S.R. (1985) “Rural Development in India: A Public policy approach’. Sage publication, New Delhi.


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