सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

देखते ही देखते जवान, माँ-बाप बूढ़े हो जाते हैं (Maa aur Pita ko Samarpit Kavita)

देखते ही देखते जवान, माँ-बाप बूढ़े हो जाते हैं..




देखते ही देखते जवान, माँ-बाप बूढ़े हो जाते हैं..

सुबह की सैर में, कभी चक्कर खा जाते है,
सारे मौहल्ले को पता है, पर हमसे छुपाते है...
दिन प्रतिदिन अपनी, खुराक घटाते हैं,
और तबियत ठीक होने की, बात फ़ोन पे बताते है...
ढीली हो गए कपड़ों, को टाइट करवाते है,
देखते ही देखते जवान, माँ-बाप बूढ़े हो जाते हैं...


किसी के देहांत की खबर, सुन कर घबराते है,
और अपने परहेजों की, संख्या बढ़ाते है,
हमारे मोटापे पे, हिदायतों के ढेर लगाते है,
"रोज की वर्जिश" के, फायदे गिनाते है,
‘तंदुरुस्ती हज़ार नियामत', हर दफे बताते है,
देखते ही देखते जवान, माँ-बाप बूढ़े हो जाते हैं..


हर साल बड़े शौक से, अपने बैंक जाते है,
अपने जिन्दा होने का, सबूत देकर हर्षाते है...
जरा सी बढी पेंशन पर, फूले नहीं समाते है,
और FIXED DEPOSIT, रिन्ऊ करते जाते है...
खुद के लिए नहीं, हमारे लिए ही बचाते है,
देखते ही देखते जवान, माँ-बाप बूढ़े हो जाते हैं...


चीज़ें रख के अब, अक्सर भूल जाते है,
फिर उन्हें ढूँढने में, सारा घर सर पे उठाते है...
और एक दूसरे को, बात बात में हड़काते है,
पर एक दूजे से अलग, भी नहीं रह पाते है...
एक ही किस्से को, बार बार दोहराते है,
देखते ही देखते जवान,माँ-बाप बूढ़े हो जाते हैं...

चश्में से भी अब, ठीक से नहीं देख पाते है,
बीमारी में दवा लेने में, नखरे दिखाते है...
एलोपैथी के बहुत सारे, साइड इफ़ेक्ट बताते है,
और होमियोपैथी/आयुर्वेदिक की ही रट लगाते है..
ज़रूरी ऑपरेशन को भी, और आगे टलवाते है.
देखते ही देखते जवान  माँ-बाप बूढ़े हो जाते हैं..


उड़द की दाल अब, नहीं पचा पाते है,
लौकी तुरई और धुली मूंगदाल, ही अधिकतर खाते है,
दांतों में अटके खाने को, तिली से खुजलाते हैं,
पर डेंटिस्ट के पास, जाने से कतराते हैं,
"काम चल तो रहा है", की ही धुन लगाते है..
देखते ही देखते जवान, माँ-बाप बूढ़े हो जाते हैं..


हर त्यौहार पर हमारे, आने की बाट देखते है,
अपने पुराने घर को, नई दुल्हन सा चमकाते है..
हमारी पसंदीदा चीजों के, ढेर लगाते है,
हर छोटी बड़ी फरमाईश, पूरी करने के लिए,
माँ रसोई और पापा बाजार, दौडे चले जाते है..
पोते-पोतियों से मिलने को, कितने आंसू टपकाते है..
देखते ही देखते जवान, माँ-बाप बूढ़े हो जाते है...


देखते ही देखते जवान,माँ-बाप बूढ़े हो जाते है...

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मलिन बस्ती में महिलाओं की शैक्षिक स्थिति का अध्ययन ( Status of Women Education in Slums in India)

मलिन बस्ती में महिलाओं की शैक्षिक स्थिति का अध्ययन गन्दी बस्तियों की अवधारणा एक सामजिक सांस्कृतिक, आर्थिक समस्या के रूप में नगरीकरण-औद्योगिकरण की प्रक्रिया का प्रत्यक्ष परिणाम है। शहरों में एक विशिष्ट प्रगतिशील केन्द्र के चारों ओर विशाल जनसंख्या के रूप में गन्दी बस्तियाँ स्थापित होती हैं। ये बस्तियाँ शहरों में अनेकानेक तरह की अपराधिक क्रियाओं एवं अन्य वातावरणीय समस्याओं को उत्पन्न करती है, नगरों में आवास की समस्या आज भी गम्भीर बनी हुई है। उद्योगपति, ठेकेदार व पूँजीपति एवं मकान मालिक व सरकार निम्न वर्ग एवं मध्यम निम्न वर्ग के लोगों की आवास संबंधी समस्याओं को हल करने में असमर्थ रहे हैं। वर्तमान में औद्योगिक केन्द्रों में जनसंख्या की तीव्र वृद्धि हुई है एवं उसी के अनुपात में मकानों का निर्माण न हो पाने के कारण वहाँ अनेको गन्दी बस्तियाँ बस गयी है। विश्व के प्रत्येक प्रमुख नगर में नगर के पाँचवे भाग से लेकर आधे भाग तक की जनसंख्या गन्दी बस्तियों अथवा उसी के समान दशाओं वाले मकानों में रहती है। नगरों की कैंसर के समान इस वृद्धि को विद्वानों ने पत्थर का रेगिस्तान, व्याधिकी नगर, नरक की संक्षिप...

बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे (Banaya hai maine ye ghar dhire dhire) By Dr. Ram Darash Mishra

बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे, खुले मेरे ख्वावों के पर धीरे-धीरे। किसी को गिराया न खुद को उछाला, कटा जिंदगी का सफर धीरे-धीरे। जहां आप पहुंचे छलांगे लगाकर, वहां मैं भी आया मगर धीरे-धीरे। पहाड़ों की कोई चुनौती नहीं थी, उठाता गया यूंही सर धीरे-धीरे। न हंस कर, न रोकर किसी ने उड़ेला, पिया खुद ही अपना जहर धीरे-धीरे। गिरा मैं कभी तो अकेले में रोया, गया दर्द से घाव भर धीरे-धीरे। जमीं खेत की साथ लेकर चला था, उगा उसमें कोई शहर धीरे-धीरे। मिला क्या न मुझको ऐ दुनिया तुम्हारी, मोहब्बत मिली, मगर धीरे-धीरे। साभार- साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित डॉ. रामदरश मिश्र  (हिन्दुस्तान (फुरसत) 1जुलाई 2018 को प्रकाशित)

युवा विधवाएं और प्रतिमानहीनता (Young Widows in India)

युवा विधवाएं और अप्रतिमानहीनता भारत में युवा विधवाएं  ‘‘जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते है’’ ऐसी वैचारिकी से पोषित हमारी वैदिक संस्कृति, सभ्यता के उत्तरोत्तर विकास क्रम में क्षीण होकर पूर्णतः पुरूषवादी मानसिकता से ग्रसित हो चली है। विवाह जैसी संस्था से बधे स्त्री व पुरूष के सम्बन्धों ने परिवार और समाज की रचना की, परन्तु पति की मृत्यु के पश्चात् स्त्री का अकेले जीवन निर्वहन करना अर्थात विधवा के रूप में, किसी कलंक या अभिशाप से कम नहीं है। भारतीय समाज में बाल -विवाह की प्रथा कानूनी रूप से निषिद्ध होने के बावजूद भी अभी प्रचलन में है। जिसके कारण एक और सामाजिक समस्या के उत्पन्न होने की संभावना बलवती होती है और वो है युवा विधवा की समस्या। चूंकि बाल-विवाह में लड़की की उम्र, लड़के से कम होती है। अतः युवावस्था में विधवा होने के अवसर सामान्य से अधिक हो जाते है और एक विधवा को अपवित्रता के ठप्पे से कलंकित बताकर, धार्मिक कर्मकाण्ड़ों, उत्सवों, त्योहारों एवं मांगलिक कार्यों में उनकी सहभागिका को अशुभ बताकर, उनके सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन को पूर्ण रूपेण प्रतिबंध...